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"संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति असीम है लेकिन वह संविधान के मूल ढांचे में परिवर्तन नहीं कर सकती ।"
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जैसा कि माननीय गृह मंत्री ने संसद में बताया कि "राज्यपाल , राज्य के प्रतिनिधि हैं" जबकि "राज्यपाल राज्य का प्रतिनिधि नहीं , केंद्र द्वारा नियुक्त, केंद्र का प्रतिनिधि मात्र है । राज्यपाल को राज्य विशेष की जनता नहीं चुनती बल्कि भारत गणराज्य के राष्ट्रपति ( केंद्र सरकार क्योंकि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने हेतु बाध्य हैं ) नियुक्त करते हैं ।" 


जम्मू कश्मीर राज्य से संबंधित अनुच्छेद 370 और 35 A , में सरकार ने परिवर्तन किया है उसकी सांविधानिकता पर प्रश्न उठने तय थे । जम्मू कश्मीर को जिस तरह राष्ट्रवाद से जोड़ा गया है और इस परिवर्तन को राज्य में फतह के रूप में प्रचारित किया गया है उसको दरकिनार कर इसकी सांविधानिकता पर विचार करने की आवश्यकता है । यह मामला माननीय सर्वोच्च अदालत में आ चुका है जो स्वाभाविक ही था । यह केवल जम्मू कश्मीर से संबंधित प्रश्न नहीं है बल्कि भारतीय संविधान से जुड़ा प्रश्न है अतः आशा है कि माननीय सर्वोच्च अदालत इस मामले को बड़ी संवैधानिक पीठ को सौंपेंगी और इस विषय पर युक्तियुक्त निर्णय करेगी ।


    भारतीय संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच संबन्ध , नए राज्यों का गठन आदि पर विस्तार से व्यवस्था की गयी है । जिसमें मुख्य निम्न हैं ---


 "भाग --1, अनुच्छेद -- 3 , नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों , सीमाओं या नामों में परिवर्तन ।


"भाग -- 6 , 'राज्य' , अनुच्छेद 152 से 237 तक ।"


"भाग --- 11, 'संघ और राज्यों के बीच संबन्ध' , अनुच्छेद -- 245 से 263 तक ।"


( भाग 12 , 'वित्त , सम्पत्ति , संविदाएं और वाद' , अनुच्छेद -- 264 से 300 A तक । यहाँ आवश्यक नहीं है ।") 


संविधान की पहली अनुसूची ।


संविधान के उपरोक्त भाग केंद्र और राज्यों के संबंधों को स्पष्ट करते हैं । संविधान देश के संघीय व्यवस्था को स्पष्ट करता है और संविधान का पहला अनुच्छेद कहता है "भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा ।"


     संविधान में संशोधन की असीम शक्ति संसद को है जिसे "अनुच्छेद 368" में स्पष्ट किया गया है जो "संविधान संशोधन की संसद की शक्ति और प्रक्रिया से संबंधित है ।"

  अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति को चुनौती देने वाले मुकदमें 60 के दशक में ही सर्वोच्च अदालत में आ गए थे । "गोलकनाथ" के मामले के बाद "केशवानन्द भारती" ( सभी केस लिखना असामयिक और विस्तृत ) के मामले में 13 जजों की बड़ी पीठ ने निर्णय दे दिया है जो वर्तमान तक मान्य है । इस मामले में अदालत ने यह माना कि "संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति असीम है लेकिन वह संविधान के मूल ढांचे में परिवर्तन नहीं कर सकती ।" यह मूल ढांचा क्या है , इसे कोर्ट ने स्पष्ट नहीं किया है अतः इसका बहुत विस्तार हो गया है । इस निर्णय के आलोक में "देश का संघीय ढांचा भी संविधान के मूल ढांचे में आता है , जिसे संसद मनमाने तरीके से बदल नहीं सकती ।"

   "किसी राज्य के नाम में परिवर्तन और उसके विभाजन की विधि अनुच्छेद 3 में निहित है ।" संसद विधि द्वारा किसी राज्य में ये परिवर्तन कर सकती है लेकिन यही अनुच्छेद संसद के मनमाने परिवर्तन पर युक्तियुक्त निर्बन्धन भी लगाता है और व्यवस्था करता है कि  "जिस राज्य में उपरोक्त परिवर्तन किया जा रहा हो , उस राज्य की विधानमंडल ( विधानसभा और जहाँ विधानपरिषद हो वहाँ उसमें भी ) के विचार हेतु भेजा जाएगा अर्थात उस राज्य की विधानमंडल द्वारा उस प्रस्ताव को पारित करना अनिवार्य है ।" 

 अभी तक जिन राज्यों का विभाजन हुआ है उसमें संविधान की इस प्रक्रिया का अनुपालन किया गया है मगर जम्मू कश्मीर के मामले में इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है और बकौल गृहमंत्री "राज्यपाल उस राज्य का प्रतिनिधि मान लिया गया है जो असंवैधानिक है ।"

    "राज्य के राज्यपाल अनुच्छेद 153", "राज्यपाल की नियुक्ति अनुच्छेद 155" , में स्पष्ट किया गया है कि राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे जबकि राज्य की जनता राज्य विधानसभा के द्वारा राज्य सरकार चुनती है । विधानसभा / विधानमंडल वास्तविक रूप से उस राज्य की प्रतिनिधत्व करते हैं ( जिस पार्टी का बहुमत हो वह सरकार बनाती है ) ।

   संविधान सभा में इस प्रश्न पर गंभीर विचारविमर्श किया गया था कि  "राज्यपाल का चुनाव अमेरिकी संघ की तर्ज पर हो या केंद्र द्वारा नियुक्ति ।" "चूंकि भारतीय गणराज्य अमेरिकी अध्यक्षीय प्रणाली से भिन्न ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की तरह है अतः जिस तरह केंद्र में राष्ट्रपति  के स्थान पर प्रधानमंत्री में मुख्य कार्यपालिका शक्ति निहित है उसी तरह की व्यवस्था राज्यों में भी की गई । राज्यपाल राज्यप्रमुख है लेकिन कार्यपालिका की शक्ति मुख्यमंत्री में निहित होती है जो राज्य की जनता द्वारा निर्वाचित होता है ।" 


      भारतीय संघ में केंद्र को राज्यों पर अधिक शक्तिशाली बनाया गया है क्योंकि भारत की परिस्थितियाँ अमेरिका से भिन्न थी । देश की एकता और अखंडता हेतु केंद्र को अधिक शक्ति दी गयी है । "अनुच्छेद 356" की व्यवस्था इसीलिए की गई है ( जिसका बहुत अधिक दुरुपयोग हुआ है ) । 

  जम्मू कश्मीर राज्य में जिस तरह का परिवर्तन किया गया है वह केंद्र सरकार की मनमानी का द्योतक है । यह प्रश्न केवल जम्मू कश्मीर राज्य में किये गए परिवर्तन तक सीमित नहीं है बल्कि "भारतीय संघीय व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला निर्णय है" अतः इसकी सांविधानिकता पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है । 


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